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Vasant Panchami in hindi : आखिर क्यों मनाया जाता है यह त्यौहार, जाने सब कुछ

vasant panchami
Written by Abhishek Pandey

Vasant Panchami Festival बसंत पंचमी त्यौहार 

 

 

Vasant Panchami प्रसिद्ध हिन्दू त्यौहार है. इस दिन विद्या की देवी मां सरस्वती की पूजा की जाती है. यह पूजा सम्पूर्ण भारतवर्ष में बड़े ही धूम-धाम से की जाती है.

 

 

 

भारत के साथ ही यह त्यौहार नेपाल, बांग्लादेश के पश्चिमी क्षेत्र और उन जगहों पर जहां हिन्दू रहते हैं वहाँ भी बहुत धूम – धाम से मनाया जाता है. इस दिन स्त्रियाँ पीले वस्त्र धारण करती हैं. वसंत पंचमी के पर्व के साथ ही ” बसंत ऋतू ” का आगमन होता है.

 

 

शांत, ठंडी, मंद वायु, कटु शीत का स्थान ले लेती है तथा सब को नवप्राण व उत्साह से स्पर्श करती है. पत्रपटल तथा पुष्प खिल उठते हैं. स्त्रियाँ पीले-वस्त्र पहन, बसंत पंचमी के इस दिन के सौन्दर्य को और भी अधिक बढ़ा देती हैं.

 

 

 

लोकप्रिय खेल पतंगबाजी, वसंत पंचमी से ही जुड़ा है. यह पर्व विद्यार्थियों, कलाकारों, कवि, लेखक, नाटककारों के लिए भी बेहद ख़ास होता है. इस दिन विद्या की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती की पूजा आराधना भी की जाती है.

 

 

 

विष्णुधर्मोत्तर पुराण में वाग्देवी को चार भुजा युक्त व आभूषणों से सुसज्जित दर्शाया गया है. स्कंद पुराण में सरस्वती जटा-जुटयुक्त, अर्धचन्द्र मस्तक पर धारण किए, कमलासन पर सुशोभित, नील ग्रीवा वाली एवं तीन नेत्रों वाली कही गई हैं.

 

 

 

रूप मंडन में वाग्देवी का शांत, सौभ्य व शास्त्रोक्त वर्णन मिलता है.संपूर्ण संस्कृति की देवी के रूप में दूध के समान श्वेत रंग वाली सरस्वती के रूप को अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है.

 

Indian Festival Vasant Panchami

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Why is Vasant Panchami celebrated? वसंत पंचमी क्यों मनाई जाती है?

 

 

 

सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य की रचना की. अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे. उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों आ॓र मौन छाया रहता है.

 

 

विष्णु से अनुमति लेकर ब्रह्मा ने अपने कमण्डल से जल छिड़का, पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही उसमें कंपन होने लगा… इसके बाद वृक्षों के बीच से एक अद्भुत शक्ति का प्राकट्य हुआ.

 

 

यह प्राकट्य एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था. अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी. ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया.

 

 

 

 

जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई. जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया. पवन चलने से सरसराहट होने लगी.

 

 

 

तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा. सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है. ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं. संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं.

 

 

बसन्त पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं. सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका है.. हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं.

 

 

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इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है. पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से ख़ुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी .

 

 

 

इसके बाद भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी जो कि आज तक जारी है.इस दिन विद्यार्थी , संगीत साधक माता सरस्वती की पूजा करते हैं.

 

 

 

वसंत पंचमी का महत्व 

 

 

वसंत ऋतू के नयी आशा का संचार करता है और दुखों, मुसीबतों से लड़ते हुए जीने की ललक पैदा करता है. वसंत ऋतू में प्रकृति अपने पुरे यौवन पर होती है.

 

 

खेतों में हरियाली छाई रहती है. उसमें सरसों के पीले  फूल अपनी एक अलग ही मनोहर छटां बिखेरते हैं. आम के पेड़ों पर मंजरियाँ लग जाती हैं. पेड़ों से पुराने पत्ते गिरते हैं और नई कोंपलें निकलने लगती हैं.

 

 

वसंत ऋतू में पटमंजरी गाने का चलन है. इसे वसंत के मौसम में आधी रात के समय गाया जाता है. शांत, ठंडी, मंद वायु, कटु शीत का स्थान ले लेती है तथा सब को नवप्राण व उत्साह से स्पर्श करती है.

 

 

 

पत्रपटल तथा पुष्प खिल उठते हैं. स्त्रियाँ पीले-वस्त्र पहन, बसंत पंचमी के इस दिन के सौन्दर्य को और भी अधिक बढ़ा देती हैं. वसंत ऋतू एक सुखद एहसास का अनुभव कराता है और इसीलिए इसे ऋतुओं का राजा अर्थात ऋतुराज कहा जाता है.

 

 

 

Vasant Panchami पर होती है माता सरस्वती की पूजा 

 

 

 

ग्रंथो के अनुसार वाग्देवी सरस्वती ब्रह्मस्वरूपा, कामधेनु तथा समस्त देवों की प्रतिनिधि हैं. ये ही विद्या, बुद्धि और ज्ञान की देवी हैं. अमित तेजस्विनी व अनंत गुणशालिनी देवी सरस्वती की पूजा-आराधना के लिए माघमास की पंचमी तिथि निर्धारित की गयी है.

 

 

 

बसंत पंचमी को इनका आविर्भाव दिवस माना जाता है. अतः वागीश्वरी जयंती व श्रीपंचमी नाम से भी यह तिथि प्रसिद्ध है. ऋग्वेद के 10/125 सूक्त में सरस्वती देवी के असीम प्रभाव व महिमा का वर्णन है.

 

 

 

माँ सरस्वती विद्या व ज्ञान की अधिष्ठात्री हैं. कहते हैं जिनकी जिव्हा पर सरस्वती देवी का वास होता है, वे अत्यंत ही विद्वान् व कुशाग्र बुद्धि होते हैं.

 

 

 

बहुत लोग अपना ईष्ट माँ सरस्वती को मानकर उनकी पूजा-आराधना करते हैं. जिन पर सरस्वती की कृपा होती है, वे ज्ञानी और विद्या के धनी होते हैं.

 

 

 

बसंत पंचमी का दिन मां सरस्वती जी की साधना को अर्पित है. शास्त्रों में माता सरस्वती की आराधना व्यक्तिगत रूप में करने का विधान है, किन्तु आजकल सार्वजनिक पूजा-पंडालों में देवी सरस्वती की मूर्ति स्थापना का विधान चल गया है.

 

 

 

यह ज्ञान का त्यौहार है और विद्यालयों में ख़ास तौर पर मनाया जाता है. विद्यार्थी पूजा स्थल को सजाने- संवारने का प्रबंध करते हैं. महोत्सव के कुछ सप्ताह पूर्व ही, विद्यालय विभिन्न प्रकार के वार्षिक समारोह मानना प्रारंभ कर देते है. संगीत, वाद-विवाद, खेल-कूद प्रतियोगिताएं एवं सांस्कृतिक समारोह आयोजित किये जाते हैं.

 

 

 

Vasant Panchami Puja- vidhi

 

 

 

प्रातः काल अपने समस्त दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर मां सरस्वती की आराधना का प्राण लें. इसके बाद भगवान् श्री गणेश का ध्यान करें. स्कन्द पुराण के अनुसार सफ़ेद पुष्प, चन्दन, श्वेत वस्त्रादि से देवी सरस्वती की पूजा की जानी चाहिए. अतः यह सब आप एकत्रित कर लें.

 

 

पूजा करने वाले व्यक्ति को नीम और तुलसी के पत्ते मिले हुए जल से स्नान करना चाहिए. स्नान से पहले व्यक्ति को शारीर पर नीम और हल्दी के मिश्रण का लेप लगाना चाहिए. स्नान के बाद पीला या सफ़ेद वस्त्र धारण करना चाहिए.

 

 

 

मूर्ति रखने के स्थान की अच्छे से सफाई करें. एक मंच पर सफ़ेद कपड़ा फैलाएं और उस पर मूर्ति रखकर उसका हल्दी कुमकुम, अक्षत, माला और फूलों से श्रृंगार करें.

 

 

 

मूर्ति के पास किताब या संगीत वाद्ययंत्र रखें. कलश को पानी से भरें फिर उसमें पांच आम के पत्ते रखें ( जो आपस में जुड़ा हो ) और उसके ऊपर सुपारी रखें. वहाँ भगवान् गणेश की मूर्ति रखें.

 

 

 

फिर माता सरस्वती अष्टाक्षर मूल मंत्र “श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा” से उनकी पूजा करें. उसके बाद सरस्वती चालीसा और गणेश चालीसा पढ़ें और सुख समृद्धि की प्रार्थना करें.

 

 

 

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