Bhakti Story

veer abhimanyu

veer abhimanyu
veer abhimanyu

veer abhimanyu महान धनुर्धारी arjun के पुत्र थे. abhimanyu भी अपने पिता की तरह एक श्रेष्ठ धनुर्धर और वीर योद्धा थे. जिन्होंने अपना पराक्रम महाभारत के समर में दिखाया. जिसके लिए दुनिया आज भी veer abhimanyu को याद करती है.

अभिमन्यु निर्भीक और क्रोधी स्वभाव के थे. इसीलिए उनका नाम अभि { निर्भीक } मन्यु { क्रोधी } अभिमन्यु पडा. veer abhimanyu ने अपने पिता arjun से धनुष विद्या का सारा ज्ञान सिखा था. मात्र १६ वर्ष की उम्र में बड़े से बड़े योद्धाओं को चुनौती देने की अपार शक्ति और सामर्थ्य abhimanyu में था. जब mahabharat का भीषण युद्ध शुरू हुआ , तो अर्जुन ने कौरव सेना का भीषण नरसंहार शुरू किया. उनके तीर मानों मृत्यु बरसा रहे थी. उनके बाणों पर स्वयं यमराज सवार होकर आ रहे थे . arjun जिधर जाते उधर शव ही शव नजर आते थे .

वही दूसरी तरफ bhim आदि योद्धाओं के साथ abhimanyu, द्रुपद और उनका पुत्र कौरव सेना पर काल बनकर टूट पड़े थे. अब mahabharat युद्ध में पितामह धराशायी हो चुके थे. उनके बाद गुरु द्रोण ने सेनापति का कार्यभार संभाला. दोनों तरफ की सेनाये मैदान में आ गयी थी. उधर दुर्योधन ने कर्ण से वचन लिया कि आज कोई भी तुम्हारे मार्ग में आ जाए तुम उसे जीवित नहीं छोड़ोगे. दोनों तरफ से शंखनाद होते ही भीषण महायुद्ध शुरू हो गया.

दुर्योधन ने युधिष्ठिर को बंदी बनाकर आज ही युद्ध समाप्त करने की योजना बनाई थी. लेकिन जब उसने देखा कि युधिष्ठिर सेना की एक टुकड़ी के साथ युद्ध मैदान में पीछे की ओर जा रहे हैं तो वह हैरान हो गया. उसने सोचा कि अवश्य ही पांडवों ने उसकी रणनीति को समझ लिया है. उसने कर्ण को युधिष्ठिर को बंदी बनाने का जिम्मा सौपा. karn युधिष्ठिर के रथ के सामने अपने तीर से एक ढाल बनाते हुए कहा ” कौन्तेय ! मैं तुम्हें युद्ध का आव्हान देता हूँ. ”

जैसे ही वह रथ मुडा तो karn के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा . क्योंकि उस रथ पर युधिष्ठिर की जगह arjun सवार थे. यह karn को दुर्योधन से दूर रखने की योजना थी. यह देखकर कर्ण ने krishna को संबोधित करते हुए कहा कि यह छल है और यह युधिष्ठिर का रथ है सो इस पर युधिष्ठिर को विराजमान होना चाहिए. तब krishna ने कहा की यह छल नहीं बल्कि रणनीति है और तुमने रथ को नहीं बल्कि रथी को ललकारा है और arjun का एक नाम कौन्तेय भी है. अब कौन्तेय ने चुनौती स्वीकार ककर ली है अतः तुम्हे अर्जुन से युद्ध करना होगा.

इधर भीम युधिष्ठिर के साथ जब दुर्योधन की तरफ बढे तो सभी युधिस्ठिर को देखकर हैरान होने के बजाय खुश होने लगे क्योंकि यह bhim के वध के लिए कौरवों की चाल थी और तभी karn ने एक सांकेतिक तीर छोड़ा , जिसका अर्थ था कि arjun bhim की रक्षा के लिए नहीं आ पायेंगे. यह देखकर दुर्योधन, अश्वस्थामा , दुहसासन शकुनी ने bhim को घेर लिया और बाकी के पांडवों को गुरु द्रोण ने आगे बढ़ने ही नहीं दे रहे थे.

bhim बड़ी ही बहादुरी से युद्ध लड़ रहे थे , लेकिन अकेले चार – चार महायोद्धाओं का सामना नहीं कर पा रहे थे और mahabharat युद्ध के बनाये नियमों के विरुद्ध भी था, लेकिन कौरवों ने बारम्बार युद्ध के नियमों को तोड़ा. जब चारो योद्धा एकसाथ bhim पर प्रहार कर रहे थे कि अचानक तीरों के तीक्ष्ण वार से उनके शस्त्र उनके हाथों छूट गए . जब उन्होंने सामने देखा तो veer abhimanyu खड़े थे.

veer abhimanyu अपने वानों की वर्षा कर दुर्योधन की रथ को रोक दिया और चक्रबांध अस्त्र से अश्वस्थामा को बाँध दिया. हालाकि अश्वस्थामा को इस अस्त्र का तोड़ पता था लेकिन वह विपरीत अस्त्र तभी कार्य करता था जब योद्धा युद्धनिति से युद्ध लड़ रहा हो. अतः अश्वस्थामा उस अस्त्र से नहीं छूट सके. इधर veer abhimanyu पुरे युद्ध क्षेत्र में सबके सामने दुर्योधन को वस्त्रविहीन कर लज्जित कर दिया. यह अपमान दुर्योधन के लिए युद्ध के हार से भी अधिक था. इस अपमान को दुर्योधन भूल नहीं पा रहा था.

तब शकुनी और अन्य कौरव योद्धाओं ने मिलकर chakravyuh के निर्माण की योजना बनाई. लेकिन इस chakravyuh में एक दुविधा थी क्योंकि अर्जुन को इस chakravyuh का तोड़ था. इसके लिए शकुनी ने त्रिगर्त नरेश सुसर्मा को एक बड़ी सेना के साथ विराट नगर पर आक्रमण लिए भेज दिया. शकुनी को यह ज्ञात था कि अगर महाराजा द्रुपद विराट नगर की सुरक्षा के लिए जाते हैं तो उनके साथ एक बहुत ही बड़ी सेना जायेगी और इससे पांडव सेना कमजोर हो जायेगी. अतः पांडव arjun को ही भेजेंगे क्योंकि अर्जुन बहुत ही कम समय में बड़ी से बड़ी सेना को अकेले ही समाप्त कर सकते हैं. और हुआ भी यही trigart के राजा susarma युद्ध के लिए arjun ही गए. चूँकि susarma यह जानते थे कि इस युद्ध में उनकी मृत्यु निश्चित है , फिर भी उनहोंने विराट नगर पर आक्रमण किया . शायद इसीलिए उसे world’s first suicide squad team leader कहा जाता है.

इधर अर्जुन विराट नगर की ओर प्रस्थान किये और दूसरी तरफ कौरवों ने चक्रव्यूह युद्ध की घोषणा कर दी. इसमें उनका सहयोग दिया जयद्रथ ने, क्योंकि एक बार जंगल में उसने द्रोपदी पर गलत नियत डाली थी , तब पांडवों ने उसके आधे बाल निकालकर उसे अपमानित किया था . तभी से उसने अपने अपमान का बदला लेने की कसम खाई थी और इसके लिए उसने महादेव की घोर साधना की और महादेव से एक दिन के लिए पांडवों कको हराने का वरदान माँगा. इसपर महादेव ने कहा कि ” मैंने अर्जुन को पाशुपास्त्र दिया है. अतः तुम अर्जुन को छोड़कर बाकी सभी पांडव को हरा सकते हो.”

veer abhimanyu
veer abhimanyu

chakravyuh की रचना हुई तो उसके मुख्य द्वार पर जयद्रथ खडा था. योजनानुसार गुरु द्रोण ने पांडवों से कहा कि अगर या तो तुम इस चक्रव्यूह की चुनौती को स्वीकार करो या फिर अपनी हार स्वीकार करो. पांडवों के लिए यह बहुत ही विकट स्थिति हो गयी थी. chakravyuh का तोड़ किसी को पता नहीं था अतः उसमे प्रवेश अर्थात किसी पांडव की मृत्यु और chakravyuh में प्रवेश नहीं करते हैं तो फिर हार.

पांडव बहुत ही चिंता में थे कि उसी समय महाराज द्रुपद ने कहा कि इस चक्रव्यूह का भेदन उन्हें ज्ञात है. उन्होंने कहा कि जिन आचार्य भरद्वाज से द्रोण ने chakravyuh सिखा है उन्ही आचार्य भरद्वाज से मैंने भी चक्रव्यूह भेदन सिखा है . अब महाराज द्रुपद ने chakravyuh में प्रवेश का निर्णय लिया और देखते ही देखते चक्रव्यूह को तहस – नहस करने लगे. लेकिन वह इसके पहले और बढ़ते उन्हें जयद्रथ ने अपने अस्त्र से बांध दिया. उसके बाद भीम ने चक्रव्यूह तोड़ने का प्रयास किया लेकिन जयद्रथ ने उन्हें भी रोक दिया.

veer abhimanyu
veer abhimanyu

अब किसी विकल्प के शेष ना रहने पर veer abimanyu ने युधिष्ठिर से चक्रव्यूह में जाने की इजाजत मांगी. उन्होंने बताया कि उन्हें चक्रव्यूह का भेदन पता है. जिसे उन्होंने गर्भ में रहते हुए अपने पिता arjun से सूना था. लेकिन उन्हें सातवाँ द्वार भेदना नहीं आता है क्योंकि तब तक उनकी माता को नींद आ गयी थी. इस पर bhim ने कहा की सातवाँ द्वार हम पांडव तोड़ देंगे.फिर भी युधिष्ठिर veer abhimanyu को चक्रव्यूह में जाने देना चाह रहे थे. अंततः उन्होंने अभिमन्यु को चक्रव्यूह में जाने की आज्ञा दे दी. पुरे चक्रव्यूह मृत्यु का तांडव होने लगा. ऐसा प्रतीत रहा था जैसे यमराज आज अपनी क्रोधाग्नि को संभाल नहीं पा रहे है. जिस तरह veer abhimanyu मुड़ते उधर का क्षेत्र शवों से पट जाता था. veer abhimanyu के बाणों का वेग इतना भीषण था जिसे कोई नहीं संभाल पा रहा था. एक अकेला अभिमन्यु उस चक्रव्यूह के असंख्य सैनिको पर भारी पड रहा था. एक – एक कर veer abhimanyu ने छह द्वार विध्वंस कर दिए. kauravon की महारथियों ने अभिमन्यु को रोकने का जितना भी प्रयास किया उस वीर अभिमन्यु की गति उतनी तीव्र होती गयी. उसके तीर अग्नि वर्षा कर रहे थे. पुरे चक्रव्यूह में हाहाकार मच गया. चारो ओर मौत का नग्न नृत्य होने लगा. veer abhimanyu ने दुर्योधन के सामने ही उसके पुत्र लक्ष्मण और उसके साथ ही ब्रिह्दल को यमलोक पहुंचा दिया .

अभिमन्यु वध abhimanyu vadh

veer abhimanyu का पराक्रम देख कर कौरव महारथी काँप उठे. युद्ध के नियम अनुसार एक एक एक महारथी के युद्ध में कोई भी अभिमन्यु को हरा नहीं पा रहा था. किसी महारथी के रथ का छत्र टूटा तो किसी की अस्त्र टूटे , तब दुर्योधन ने एक साथ veer abhimanyu पर आक्रमण करने का आदेश दिया. यह mahabharat युद्ध का सबसे सबसे बड़ा नियम भंग था. सभी महारथियों ने एक साथ अभिमन्यु पर वार किया. अभिमन्यु का रथ टूट गया. वह शस्त्र विहीन हो गए, लेकिन veer abhimanyu ने हार नहीं मानी . अभिमन्यु का पूरा शरीर बाणों से भर गया था. हर अंग से रक्त निकल रहा था, लेकिन वह अर्जुन पुत्र veer abhimanyu निहत्थे होने पर रथ के पहिये को हाथ में उठा कर शत्रु के तरफ लपका , लेकिन तभी दुशासन के बेटे ने पीछे से गदा से और शकुनी ने तलवार से वार गिया. इस वार से वह वीर बालक veer abhimanyu धरा पर गिरा तो कभी नहीं उठ सका. वह पांडव कुल का वीर योद्धा कायर कौरवों से परम वीरता से लड़ते हुए सदा के लिए अमर हो गया. veer abhimanyu के भूमि पर गिरते ही कौरव महारथी निर्लज्जों की भाँती अट्टहास करने . उन्हें तनिक भी लज्जा नहीं आई.

इधर पांडव शोक से व्याकुल हो गए. जब यह बात अर्जुन को पता चली तो उनके पीड़ा की सीमा नहीं रही. इधर पांडव शोक मना रहे थे और उधर निर्लज्ज कौरव हर्ष मना रहे थे. veer abhimanyu की शोक सभा में karn भी पहुंचा , karn को देखते ही भीम उसे मारने उठे, लेकिन युधिष्ठिर ने उन्हें यह कहते हुये रोक लिया कि हम पांडव है कौरव नहीं. कर्ण के समक्ष ही arjun ने शपथ ली कि कल वे जयद्रथ का वध कर देंगे और अगर ऐसा नहीं कर सके तो युद्धक्षेत्र में स्वयं मृत्यु को प्राप्त हो जायेंगे. उन्होंने karn को संबोधित करते हुए कहा कि वे इस बात को कौरव तक पहुंचा दें. कल के युद्ध के पश्चात ही veer abhimanyu की चिता को अग्नि दी जायेगी.

जयद्रथ वध jaydrath vadh

यह खबर सुनते ही जयद्रथ को मृत्यु साक्षात दिखाई देने लगी. वह अपने राज्य भागना चाहता था, लेकिन शायद यह प्रभु की लीला ही थी कि शकुनी ने अपनी चपल बुद्धि से उसे नहीं जाने दिया. गुरु द्रोण ने अर्जुन को रोकने की लिए व्यूह के अन्दर व्यूह की रचना की और जयद्रथ को अंतिम व्यूह के अन्दर रखा गया , जिसकी सुरक्षा स्वयं गुरु द्रोण , दुर्योधन जैसे योद्धा कर रहे थे.

यह युद्ध बहुत भीषण होने वाला था. अर्जुन के गांडीव की टंकार मात्र से कौरव सेना में खलबली मच गयी. arjun ने मात्र एक तीर से अश्वस्थामा को बाँध दिया . अश्वस्थामा अर्जुन का प्रतिउत्तर भी नहीं दे सके. आज अर्जुन के बाण मृत्यु बरसा रहे थे. उनके सामने कोई भी नहीं टिक पा रहा था. आज चारो तरफ मृत्यु की आंधी चल रही थी. आज अर्जुन के बाणों का तेज गुरु द्रोण को भी महसूस हो रहा था. उधर दृष्टद्युम्न ने भी कौरव सेना में आतंक मचा रखा था. आज कौरव सेना दृष्टद्युम्न का रौद्र रूप देख रही थी. उधर भीम दुर्योधन के भाइयों को यमलोक पहुंचा रही थे. ऐसा प्रतीत हो रहा था कि पांडव सेना नहीं बल्कि स्वयं यमराज युद्ध क्षेत्र में उपस्थित हो गए हों.

veer abhimanyu
veer abhimanyu

आज अर्जुन के सामने karn को छोड़कर कोई नहीं टिक पाया. लेकिन जब krishna ने देखा कि अब समय शेष नहीं है और सूर्यास्त होने वाला है तो उन्होंने अपने sudarshan chakra से सूर्य को ढँक दिया ( कहीं कहीं इसे सूर्यग्रहण भी बताया गया है ) . जब जयद्रथ ने यह देखा कि सूर्यास्त हो गया है तो वह व्यूह से बाहर आ गया और शकुनी, दुर्योधन , जयद्रथ सभी अट्टहास करने लगे, लेकिन तभी krishna का sudarshan chakra हटा और सूर्य की लालिमा फ़ैलने लगी. यह देख सभी आश्चर्य में पड गए. तब krishna ने अर्जुन को बाण चलाने का आदेश दिया और arjun ने सर्पस्त्र से जयद्रथ का सिर काट दिया और जयद्रथ का सिर सीधे उसक्के पिता की गोद ण जा गिरा और वे जयद्रथ का सिर देखते ही उठ खड़े हुए और उसी के साथ ही जयद्रथ का सिर उनके हाथ से छूट कर जमीन पर र पड़ा , जिससे जयद्रथ के ऋषि पिता के सिर के सौ टुकड़े हो गए , क्योंकि जयद्रथ को यह आशीर्वाद था कि जो भी उसका सिर जमीन पर गिराएगा उसके सिर के सौ टुकड़े हो जायेंगे. इसलिए शकुनी जयद्रथ को युद्ध से भागने नहीं दिया था क्योंकि जयद्रथ के मरने और जीवित रहने दोनों में ही अर्जुन की मृत्यु थी, लेकिन कहा गया है कि जो सत्य के साथ होता है भगवान उसके साथ होता है. पांडवो ने वापस शिविर में लौटकर veer abhimanyu की अंतिम क्रिया संपन्न की. मित्रों मेरी यह bhakti kahani veer abhimanyu आपको कैसी लगी अवश्य ही बताएं और भी अन्य bhakti story के लिए इस लिंक https://www.hindibeststory.com/mahan-dhanurdhar-ekalavya-ki-kahani-bhakti-story/ पर क्लिक करें.

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