Vikramaditya . विक्रमादित्य की पूरी कहानी जानिये हिंदी में

Vikramaditya Story in Hindi   विक्रमादित्य की पूरी कहानी

 

 

Vikramaditya की कहानी एक बार की बात है . स्वर्गलोक में सबसे बड़े और महान ग्रह कौन के प्रश्न को लेकर सभी देवताओं में वाद-विवाद प्रारम्भ हुआ और फिर परस्पर भयंकर युद्ध की स्थिति बन गई.

 

 

 

सभी देवता देवराज इंद्र के पास पहुंचे और बोले, ” हे देवराज! आपको निराने करना होगा कि नौ ग्रहों में सबसे बड़ा कौन है? ” देवताओं से यह प्रश्न सुन राजा इंद्र भी बड़े उलझन में पड़ गए.

 

 

वे किसी एक का पक्ष नहीं ले सकते थे ऐसे में दुसरे के नाराज होने की पूरी संभावना थी. अतः उन्होंने निर्णय किया यह विषय किसी दुसरे के द्वारा सुलझाया जाए.

 

 

कुछ देर सोचने के पश्चात उन्होंने कहा, ” देवगणों मैं इस प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थ हूँ. मैं एक सुझाव देता हूँ. पृथ्वीलोक में उज्जयनी नगरी में राजा विक्रमादित्य का राज्य है. हम सभी राजा Vikramaditya के पास चलते हैं और उनसे न्याय्य की प्रार्थना करते हैं. वे अत्यंत ही लोकप्रिय राजा हैं. उनके पास अवश्य ही कोई जादू है जो सत्य और असत्य को अलग-अलग करता है.”

 

 

विक्रमादित्य की कथा Hindi Kahani

 

 

 

देवराज इंद्र के आदेश पर सभी देवता पृथ्वी की और चले साथ देवराज भी थे. देवताओं के आगमन का समाचार सुन स्वयं राजा विक्रमादित्य ने उनका स्वागत किया.

 

 

 

महल में पहुंचकर जब देवताओं ने उनसे अपना प्रश्न पूछा तो राजा विक्रमादित्य भी कुछ देर के लिए परेशान हो उठे. कारण भी था सभी देवता अपनी-अपनी शक्तियों के कारण महान शक्तिशाली थे.

 

 

किसी को छोटा या बड़ा कह देने का साफ मतलब था की उसकी नाराजगी झेलना. विक्रमादित्य सोचने लगे, तभी उनके दिमाग में एक उपाय आया. उन्होंने विभिन्न धातुओं- स्वर्ण, रजत, कांसा, ताम्बा, सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक और लोहे के नौ आसन मंगवाए.

 

 

धातुओं के अनुसार सभी आसनों  को एक – दुसरे के पीछे रखावाकर उन्होंने देवताओं को अपने- अपने सिंहासन पर बैठने को कहा. सब देवताओं के बैठने के बाद राजा ने कहा, ” आपका निर्णय तो स्वयं ही हो गया. जो सबसे पहले सिंहासन पर है वही सबसे बड़ा है.”

 

 

राजा के निर्णय को सुनकर शनि देव सबसे पीछे बैठे होने के कारण सबसे छोटे हो गए. इससे इन्हें बहुत क्रोध आया. उन्होंने क्रोध में भरकर कहा, ” राजन! तुमने मेरा अपमान किया है. शायद तुम्हे मेरी शक्तियां ज्ञात नहीं है. तुम्हे इसका दंड भोगना होगा.”

 

 

Vikramaditya Stories

 

 

 

“सूर्य एक राशि पर एक महीने, चन्द्रमा सवा दो दिन, मंगल डेढ़ महीने, बुध और शुक्र एक महीने, वृहस्पति तेरह महीने रहते हैं. लेकिन मैं किसी राशि पर साढ़े सात वर्ष रहता हूँ. मैंने बड़े-बड़े देवताओं को अपने प्रकोप से पीड़ित किया है. भगवान् राम को साढ़े साती के कारण ही वन में रहना पड़ा और रावण को साढ़े साती के कारण ही युद्ध में पराजय मिली और उसकी मृत्यु हुई. उसका सर्वनाश हो गया. राजा अब तुम्हे भी मेरे प्रकोप से पीड़ित होना होगा” शनिदेव ने बड़े ही क्रोध से कहा.

 

 

राजा  Vikramaditya शनिदेव के क्रोध से थोड़े भयभीत हुए. फिर उन्होंने विचार किया मैंने कोई गलत कार्य नहीं किया है. अतः जो भाग्य में होगा वह मिलेगा.

 

 

उसके बाद अन्य ग्रहों के देवता तो प्रसन्नता के साथ वहां से चले गए, लेकिन शनिदेव बड़े क्रोध के साथ वहां से विदा हुए. राजा विक्रमादित्य पहले की तरह ही न्याय करते रहे.

 

 

 

उनके राज्य में सभी स्त्री पुरुष बहुत आनंद से जीवन-यापन कर रहे थे. कुछ दिन ऐसे ही बीत गए. उधर शनिदेवता अपने अपमान को भूले नहीं थे. विक्रमादित्य से बदला लेने के लिए एक दिन शनिदेव ने घोड़े के व्यापारी का रूप धारण किया और बहुत से घोड़ों के साथ उज्जयिनी नगरी में पहुंचे.

 

 

 

राजा विक्रमादित्य ने राज्य में घोड़े के व्यापारी के आने का समाचार सूना तो अपने अश्वपाल को कुछ घोड़े खरीदने के लिए भेजा. अश्वपाल घोड़ों को देख बहुत ही खुश हुआ, लेकिन उसे घोड़ों की कीमत सुनकर बड़ी हैरानी हुई. घोड़ों की कीमत कुछ ज्यादा थी.

 

 

 

वह दरबार वापस लौटा और सारी बात राजा को बताई. राजा स्वयं उस व्यापारी के पास आये और शक्तिशाली घोड़ा पसंद किये. जब वे घोड़े की चाल देखने के लिए घोड़े पर सवार हुए तो वह घोड़ा बिजली की गति से दौड़ा और सुदूर एक घने जंगल में राजा को गिराकर अदृश्य हो गया.

 

 

 

राजा अपने नगर को लौटने के लिए जंगल में भटकने लगा. लेकिन उसे लौटने का कोई रास्ता नहीं मिला. राजा को भूख-प्यास लग आई. बहुत घूमने पर उसे एक चरवाहा मिला.

 

 

Hindi Story हिंदी कहानी

 

 

राजा ने उससे पानी मांगा. पानी पीकर राजा ने उस चरवाहे को उपहार स्वरुप अपनी अंगूठी दे दी, फिर उससे रास्ता पूछकर वह जंगल से बाहर निकलकर पास के नगर में पहुंचा.

 

 

 

राजा ने एक सेठ की दूकान पर बैठकर कुछ देर आराम किया. उस दौरान उस सेठ की दुकार पर खूब ग्राहक आये और सामानों की खूब बिक्री हुई.

 

 

बातचीत में राजा ने बताया की मैं उज्जयनी से आया हूँ. सेठ ने राजा को भाग्यवान समझा और घर पर भोजन के लिए ले गया. सेठ के घर में खूंटी पर एक हीरे का हार टंगा था.

 

 

राजा को उस कमरे में छोड़कर वह सेठ कुछ देर के लिए बाहत गया, तभी  एक आश्चर्यजनक घटना घटी. राजा के देखते-देखते वह खूंटी हीरे के  हार को निगल गयी.

 

 

जब सेठ वापस आया तो हार ना देखकर राजा से हार के बारे में पूछा. राजा ने जो देखा था वही बता दिया. सेठ ने कहा भला खूंटी हार कैसे निगल सकती है. चोरी तुमने की है. मैं ही निरा मुर्ख था जो एक अजनबी को घर में भोजन के लियए लाया.

 

 

उसने अपने नौकरों से राजा को रस्सी से बांधकर नगर के राजा के पास चलने को कहा. वहाँ भी उस नगर के राजा ने वही सवाल किया. राजा विक्रमादित्य ने फिर से कहा की खूंटी हार को निगल गयी.

 

 

नगर के राजा को इससे बड़ा ही क्रोध आया. उन्होंने राजा विक्रमादित्य के हाथ – पैर काटने का आदेश दे दिया. राजा विक्रमादित्य के हाथ-पांव काटकर उसे नगर की सड़क पर छोड़ दिया गया.

 

 

Vikramaditya की लोक कथा

 

 

 

कुछ दिन बाद एक तेली उसे उठाकर अपने घर ले गया और उसे अपने कोल्हू पर बैठा दिया. राजा आवाज देकर बैलों को हांकता रहता. इस तरह तेली का बैल चलता रहा और राजा को भोजन मिलता रहा.

 

 

 

शनि के प्रकोप की साढ़े साती पूरी होने पर वर्षा ॠतु प्रारम्भ हुई. राजा विक्रमादित्य एक रात मेघ मल्हार गा रहे थे कि तभी नगर के राजा की लड़की राजकुमारी मोहिनी रथ पर सवार उस तेली के घर के पास से गुजरी.

 

 

 

उसने मेघ मल्हार सुना तो उसे बहुत अच्छा लगा और दासी को भेजकर गानेवाले को बुला लाने को कहा. दासी ने लौटकर राजकुमारी को अपंग राजा के बारे में सब कुछ बता दिया. राजकुमारी उसके मेघ मल्हार पर बहुत मोहित हुई थी. अत:उसने सब कुछ जानकर भी अपंग राजा से विवाह करने का निश्चय कर लिया.

 

 

 

राजकुमारी ने अपने माता-पिता से जब यह बात कही तो वे हैरान रह गए. राजा और रानी ने बेटी को बहुत समझाया, ” बेटी तू एक राजकुमारी है. विवाह के बाद तुझे रानी बनाना है. राजमहल में रहना है और तू उस  अपंग ( दिव्यांग ) के साथ विवाह करेगी. ”

 

 

लाख समझाने के बाद भी जब राजकुमारी नहीं मानी और अन्न जल त्याग दिया तो उसके इस पागलपन के आगे राजा रानी को झुकना पड़ा और उन्होंने उसका विवाह विक्रमादित्य से कर दिया.

 

 

 

विवाह के बाद राजा और राजकुमारी तेली के घर रहने लगे. एक रात राजा को स्वप्न में शनिदेव ने कहा, ” राजन! तुमने मेरा प्रकोप तो देख लिया. मैंने तुम्हे अपने अपमान का दंण्ड दिया है. राजा ने शनिदेव से क्षमा मांगी और कहा,” जितना मुझे आपने दुःख दिया है. उतना किसी को मत देना”.

 

 

शनिदेव ने कुछ सोचकर कहा, ” राजन! मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करता हूँ. जो कोई स्त्री- पुरुष शनिवार के दिन मेरी पूजा करेगा, व्रत करके मेरी कथा सुनेगा, पाप कर्म नहीं करेगा, चींटियों को आटा खिलायेगा, उस पर मेरी कृपा बनी रहेगी. उसे कोई दुःख नहीं होगा. ”

 

 

 

जब प्रात:काल राजा विक्रमादित्य की नींद खुली तो अपने हाथ-पांव देखकर राजा को बहुत खुशी हुई. उसने मन-ही-मन शनिदेव को प्रणाम किया. राजकुमारी भी राजा के हाथ-पांव सही सलामत देखकर आश्चर्य में डूब गई.

 

 

 

तब राजा विक्रमादित्य ने अपना परिचय देते हुए शनिदेव के प्रकोप की सारी कहानी कह सुनाई. सेठ को जब इस बात का पता चला तो दौड़ता हुआ तेली के घर पहुंचा और राजा के चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगा.

 

 

 

राजा ने उसे क्षमा कर दिया, क्याेंकि यह सब तो शनिदेव के प्रकोप के कारण हुआ था. सेठ राजा को अपने घर ले गया और उसे भोजन कराया. भोजन करते समय वहां एक आश्चर्यजनक घटना फिर घटी.

 

 

सबके देखते-देखते उस खूंटी ने वह हार उगल दिया. सेठजी ने अपनी बेटी का विवाह भी राजा के साथ कर दिया और बहुत से स्वर्ण-आभूषण, धन आदि देकर राजा को विदा किया.

 

 

 

राजा विक्रमादित्य राजकुमारी और सेठ की बेटी के साथ उज्जयनी पहुंचे तो नगरवासियों ने उनका हर्षोल्लास से स्वागत किया. उसके अगले दिन राजा विक्रमादित्य ने पुरे राज्य में  घोषणा करवा दी की शनि देव नों ग्रहों में सर्वश्रेष्ठ है. वे न्याय के देवता हैं.

 

 

 

मित्रों यह स्टोरी Vikramaditya आपको कैसी लगी जरुर बताएं और Vikramaditya की तरह की कहानी के लिए ब्लॉग को सबस्क्राइब जरुर करें और दूसरी पोस्ट को नीचे पढ़ें.

 

1- Durvasa . महर्षि दुर्वासा की कथा . सती अनसुइया की कथा .

3- Moral Story

You may also like...

Leave a Reply