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vindhyachal mandir

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Written by Hindibeststory

vindhyachal mandir १०८ पीठों में बहुत ही महत्वपूर्ण है. यह एक बहुत ही जागृत स्थान है, जहां मांगी गयी हर मनोकामना को माँ विध्यवासिनी जरुर ही पूरा करती हैं. हर वर्ष दोनों ही नवरात्रों में यहाँ बहुत भीड़ होती है. देश के कोने कोने से यहाँ लाखों श्रद्धालु माता रानी के दर्शन हेतु आते हैं. तमाम साधक विंध्यांचल धाम तथा पर्वत पर ९ दिनों तक अपनी साधना करते है. हर मंगलवार और शनिवार को vindhyachal mandir में बहुत अधिक भीड़ होती है.

विन्ध्य क्षेत्र मां गंगा और विराट विन्ध्य पर्वत माला के बीच में स्थित है. इस क्षेत्र में त्रिशाक्तियाँ यानी कि महालक्ष्मी , महाकाली और महालक्ष्मी ने अपना आवास बनाया. मां पार्वती ने यहीं तपस्या कर अपर्णा नाम पाया और शिव को प्राप्त किया. भगवान् श्रीराम ने यहीं के रामगंगा घाट पर अपने पितरों को श्राद्ध तर्पण किया और रामेश्वर लिंग की स्थापना की और रामकुंड का निर्माण किया. पुरानों के अनुसार इसी तपोभूमि में भगवान् विष्णु को सुदर्शन चक्र की प्राप्ति हुई थी.

विराट विन्ध्य पर्वत माला के सुरम्य अंचलों में श्री यन्त्र पर स्थापित विन्ध्याचल अनादिकाल से शक्ति की लीला भूमि रही है. देश के १०८ शक्तिपीठों 12 महापिठों में यह अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है. रुद्रायमाला के अनुसार यहाँ शक्ति का पृष्ठ भाग ग्गिरा था. नारद पुराण के अनुसार जहां पर विन्ध्य पर्वत और गंगा का संगम होता है उस स्थान अर्थात vindhyachal का पुण्य प्रयाग से १० गुना अधिक है. पुरानों में vindhyachal mandir को शक्ति पीठ , सिद्ध पीठ और मणि द्वीप कहा गया है.मणि द्वीप पर मां जगदम्बा सदैव् वास करती हैं.

vindhyachal mandir में मां महालक्ष्मी विराजती हैं. इनका यह मंदिर विन्ध्याचल नगर के मध्य एक ऊँचे स्थान पर है. मंदिर में २.५ हाथ का सिन्हारूढ़ देवी का विग्रह है. vindhyachal mandir के पश्चिम में स्थित प्रांगण के पश्चिमी भाग में बारह्भूजी देवी हैं तथा दुसरे भाग में खर्पेश्वर शिव हैं, दक्षिण में महाकाली विराजमान हैं और उत्तर में धर्मध्वजा देवी हैं.

लोगों के अनुसार पहले मंदिर वनदेवी के रूप में प्रसिद्ध था, जहां कोल भील मां की आराधाना वनदेवी और वनदुर्गा के रूप में करते थे. वर्तमान का यह vindhyachal mandir कितना प्राचीन है यह बता पाना कठिन है किन्तु जनश्रुति है की इस मंदिर का निर्माण विक्रम संवत १६४६ में हुआ है. पहले उन्हें अरण्याति देवी कहा जाता था. त्रिकोण यन्त्र स्थित यह स्थान बहुत ही पुण्यदायी है. विंध्यवासिनी इनकी अधिष्ठात्री देवी है. विख्यात श्री यन्त्र माता त्रिपुरा सुंदरी का यंत्र है, जिसे यंत्रराज कहा गया है.ऐसी मान्यता है की vindhyachal mandir की यात्रा तब तक पूरी नहीं होती जबतक त्रिकोण यात्रा ना कर ली जाए.

यहाँ से लगभग ३ किलोमीटर दूर काली खोह है , जहां मां काली विराजमान हैं. मां काली की यह प्राचीन प्रतिमा रक्तबीज संहार का रूप लक्षण प्रदर्शित करती है. यहाँ तांत्रिक अनुष्ठान की क्रिया अनवरत चलती रहती है. मंदिर के प्रांगण में विद्यमान कूप का जल आरोग्य प्रदायक है. माँ काली के दर्शन के बाद भक्त महासरस्वती के दर्शन हेतू अष्टभुजी जाते हैं. वहा जाने के दो मार्ग हैं. इक पदयात्रियों के लिए जो मंदिर के पास से ही कुछ सीढियां चढ़कर ऊपर पहाड़ी पर समाप्त होती हैं और वहाँ से समतल भूमि पर चलते हुए भक्त मंदिर तक पहुंचता है.दूसरा राजमार्ग है जहां से भक्त वाहन से मंदिर के निकट पहुंचकर सीढियां चढ़कर मंदिर परिशर तक पहुंचते हैं.

पदयात्रा वाले भक्त अक्सर गेरुहवा तालाब पर विश्राम भी करते हैं.वहाँ साक्षी गोपाल श्री कृष्णा मंदिर में भगवान श्री कृष्णा का दर्शन करते हुए मां अष्टभुजी के धाम पहुंचते हैं. यह त्रिकोण यात्रा का अंतिम पड़ाव है, जहां मां दुर्गा ही मां सरस्वती के रूप में विराजमान हैं. श्री मार्कंडेय पुराण के अनुसार यह भगवान् श्रीकृष्ण की बहन हैं जिन्हें क्रूर कंस ने शिला पर पटककर मारना चाहा था और वे श्रीकृष्ण के जन्म का समाचार देते हुए अंतर्ध्यान हो गयीं थीं.

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