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Vishwamitra Story in Hindi. महर्षि विश्वामित्र की कथा। कैसे विश्वामित्र बने ब्रह्मर्षि

Vishwamitra Story
Written by Abhishek Pandey

Vishwamitra ki Kahani विश्वामित्र की कहानी 

 

 

Vishwamitra Story in Hindi मिथिला में वहाँ  राजपुरोहित शतानंद जी भगवान से बहुत प्रभावित हुए।  उन्होंने कहा, ” हे राम ! आप बहुत सौभाग्यशाली हैं कि आपको विश्वामित्र जैसे गुरु मिले।  वे महान प्रतापी और तेजस्वी महापुरुष हैं।  ”

 

 

 

उनके इस बात पर प्रभु श्रीराम विश्वामित्र जी के बारे में और अधिक जानने की जिज्ञासा  प्रकट की।  इस पर शतानंद जी विश्वामित्र जी के बारे में विस्तार से बताना शुरू किया।

 

 

 

उन्होंने कहा ब्राह्मणत्व की प्राप्तिके पूर्व ऋषि विश्वामित्र बड़े ही पराक्रमी और प्रजावत्सल राजा थे।  प्रजापति के पुत्र कुश, कुश के पुत्र कुशनाभ और कुशनाभ के पुत्र राजा गाधि थे।

 

 

 

ये सभी महान पराक्रमी और शूरवीर थे।  Vishwamitra Ji उन्ही महान पराक्रमी गाधि के पुत्र हैं।  एक बार की बात है विश्वामित्र अपनी सेना सहित ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के आश्रम में गए।

 

 

 

उस समय ब्रह्मर्षि  वशिष्ठ यज्ञ कर रहे थे।  विश्वामित्र जी उन्हें प्रणाम कर वहीँ बैठ गए।  यज्ञ क्रिया से निवृत्त होने के पश्चात वशिष्ठ जी ने विश्वामित्र जी का बहुत आदर सत्कार किया और कुछ दिन आश्रम में रह कर आतिथ्य ग्रहण करने का अनुरोध किया।

 

 

 

इस पर विश्वामित्र ने यह सोचकर कि इतनी विशाल सेना के साथ यहां रुकने से वशिष्ठ जी को कष्ट होगा, इसलिए उन्होंने नम्रतापूर्वक वशिष्ठ जी से विदा होने की अनुमति मांगी।

 

 

 

विश्वामित्र की कथा 

 

 

किन्तु वशिष्ठ जी के अत्यधिक अनुरोध करने पर थोड़े दिनों के लिये राजा विश्वामित्र को उनका आतिथ्य स्वीकार करने के लिए विवश होना पड़ा।

 

 

 

राजा विश्वामित्र के आतिथ्य स्वीकार कर लेने पर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ जी ने कामधेनु गौ से विश्वामित्र और उनकी सेना के लिए छह प्रकार के व्यंजन तथा समस्त प्रकार की सुविधाओं की व्यवस्था करने की प्रार्थना की।

 

 

 

उनकी इस प्रार्थना को स्वीकार करके कामधेनु गौ ने सारी व्यवस्था कर दिया। वशिष्ठ जी के अतिथि सत्कार से राजा विश्वामित्र और उनके साथ आये सभी लोग बहुत प्रसन्न हुये।

 

 

 

कामधेनु गौ का चमत्कार देखकर विश्वामित्र जी के मन में लालच हो गैया।  उन्होंने कहा, ” ऋषिश्रेष्ठ ! गामधेनु गौ किसी वनवासी नहीं वरन राजा महाराजाओं के पास शोभा देती है।  अतः आप इसे मुझे  दे दीजिये।  इसके बदले आपको मैं सहस्त्रों स्वर्ण मुद्राएं दे सकता हूँ।  ”

 

 

 

 

इस पर वशिष्ठ जी ने कहा, ” राजन ! यह गौ ही मेरा जीवन है और इसे मैं किसी भी कीमत पर नहीं दे सकता हूँ। ” वशिष्ठ जी के इस प्रकार कहने पर विश्वामित्र जी जबरदस्ती कामधेनु गाय को ले जाने का आदेश सैनिकों को दे दिया।

 

 

 

इससे क्रोधित होकर वशिष्ठ जी के कहने पर कामधेनु ने  योगबल से पह्नव सैनिकों की एक सेना उत्पन्न कर दिया और वह सेना विश्वामित्र की सेना के साथ युद्ध करने लगी।

 

 

 

 

विश्वामित्र जी ने अपने पराक्रम से समस्त पह्नव सेना का विनाश कर डाला। इस पर कामधेनु ने सहस्त्रों शक, हूण, बर्वर, यवन और काम्बोज सैनिक उत्पन्न कर दिया।

 

 

 

जब विश्वामित्र ने उन सैनिकों का भी वध कर डाला तो कामधेनु ने मारक शस्त्रास्त्रों से युक्त अत्यंत पराक्रमी योद्धाओं को उत्पन्न किया जिन्होंने शीघ्र ही राजा विश्वामित्र की सेना को गाजर मूली की भाँति काटना आरम्भ कर दिया।

 

 

 

अपनी सेना को इस तरह नष्ट होते देखकर विश्वामित्र के सौ पुत्र अत्यंत क्रोधित होकर वशिष्ठ जी को मारने दौड़े।  वशिष्ठ जी ने उसमें से एक को बाकी सभी को योगबल से भस्म कर दिया।

 

 

 

सेना तथा पुत्रों के नष्ट हो जाने से विश्वामित्र जी बड़े दुखी हुए। अपने बचे हुए पुत्र का राजतिलक कर वे तपस्या करने के लिए हिमालय चले गए।  वहाँ   उन्होंने  भगवान शिव की घोर तपस्या की।

 

 

 

उन्होंने महादेव से तमाम अस्त्र – शस्त्र और दिव्य शक्तियों का ज्ञान प्राप्त किया और उसके बाद वे सीधा वशिष्ठ जी के आश्रम पहुंचे और उन्हें ययुद्ध के लिए ललकारते हुए अग्निबाण चला दिया।

 

 

 

विश्वामित्र स्टोरी इन हिंदी 

 

 

 

अग्निबाण से पुरे आश्रम में आग लग गयी और आश्रमवासी भयभीत होकर इधर – उधर भागने लगे।  यह देखकर वशिष्ठ जी भी  क्रोधित होकर युद्ध करने लगे।

 

 

 

क्रुद्ध होकर विश्वामित्र ने एक के बाद एक आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, रुद्रास्त्र  जैसे घातक अस्त्रों को एक साथ छोड़ा जिन्हें वशिष्ठ जी ने अपने मारक अस्त्रों से मार्ग में ही नष्ट कर दिया।

 

 

 

इस पर विश्वामित्र ने और भी अधिक क्रोधित होकर मानव, मोहन, गान्धर्व, जूंभण, दारण, वज्र, ब्रह्मपाश, कालपाश, वरुणपाश, पिनाक, दण्ड, पैशाच, क्रौंच, धर्मचक्र, कालचक्र, विष्णुचक्र, वायव्य, मंथन, कंकाल, मूसल, विद्याधर, कालास्त्र आदि सभी अस्त्रों का प्रयोग कर डाला।

 

 

 

वशिष्ठ जी ने उन सबको नष्ट करके ब्रह्मास्त्र छोड़ने के लिये जब अपना धनुष उठाया तो सब देव किन्नर आदि भयभीत हो गये। किन्तु वशिष्ठ जी तो उस समय अत्यन्त क्रुद्ध हो रहे थे। उन्होंने ब्रह्मास्त्र छोड़ ही दिया।

 

 

 

ब्रह्मास्त्र के भयंकर अग्नि और नाद से सारे संसार में त्राहिमाम मच गया।  सभी ऋषि – मुनि उनसे प्रार्थना करने लगे।  इस प्रार्थना से द्रवित होकर और लोगों के कल्याण हेतु ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने ब्रह्मास्त्र को वापस बुला लिया।

 

 

 

वशिष्ठ जी के तेज के सम्मुख नहीं टिकने पर विश्वामित्र जी दृढ संकल्प लिया कि वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त अवश्य करेंगे और महर्षि कहलायेंगे।  इस प्रकार विचार करके वे अपनी पत्नीसहित दक्षिण दिशा की ओर चल दिये।

 

 

 

उन्होंने तपस्या करते हुए अन्न जल का त्याग करते हुए फलों पर जीवन – यापन करना शुरू किया।  उन्होंने कठोर तप किया।  उनके इस तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें राजर्षि का पद दिया, लेकिन विश्वामित्र जी तो  ब्रह्मर्षि का पद चाहते थे।

 

 

 

इसपर ब्रह्मदेव ने कहा ब्रह्मर्षि  का पद तो केवल ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ही दे सकते हैं। इस पर विश्वामित्र जी और अधिक तपस्या करने लगे।  उनकी तपस्या से दिग – दिगंत काम उठे, लेकिन उन्हें फिर भी वैसी सफलता नहीं मिली।

 

 

 

इस पर विश्वामित्र जी ने सोचा जरूर इसमें वशिष्ठ जी का कोई छल है।  वही जानबूझ कर ब्रह्मर्षि का पद नहीं देना चाहते हैं।  यह सोचकर विश्वामित्र जी के मन में अत्यंत क्रोध उत्पन्न हुआ।

 

 

 

वशिष्ठ जी का वध करने का निश्चय कर वे उनके आश्रम पहुंचे।  उन्होंने देखा कि चाँदनी रात में वशिष्ठ जी अपने शिष्यों  संग चर्चा कर रहे थे।  विश्वामित्र जी वहीँ छुप गए।

 

 

 

 

तभी एक शिष्य ने ब्रह्मर्षि वशिष्ठ से पूछा, ” भगवन ! स्वच्छ आकाश में प्रकाश फैला रहे शीतल चाँद को देखकर आपके मन में क्या विचार आ रहे हैं ? ”

 

 

 

तब ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने कहा, ” चाँद वैसे ही पुरे संसार को प्रकाशित कर रहा है जैसे विश्वामित्र का यश।  ” यह सुनकर विश्वामित्र को बड़ा आश्चर्य हुआ।  उनके मन के सारे अवगुण नष्ट होते गए।  वे वशिष्ठ जी चरणों गिर पड़े।

 

 

 

वशिष्ठ जी ने उन्हें उठाते हुए कहा, ” उठो ब्रह्मर्षि ”  . यह सुनते ही विश्वामित्र सहित समस्त सृष्टि चौंक पड़ी।  इस  पर वशिष्ठ जी ने कहा, ” आप हर से इस पद के योग्य थे।  बस आपके मन में पद की लालसा और अहंकार था, जो कि आज ख़त्म हो गया।  ” इस तरह से विश्वामित्र जी ने ब्रह्मर्षि का पद पाया।

 

 

 

त्रिशंकु की स्वर्गयात्रा और  विश्वामित्र द्वारा नए स्वर्ग का निर्माण Vishwamitra Story in Hindi

 

 

 

इक्ष्वाकु वंश में त्रिशंकु नाम के एक राजा हुये। त्रिशंकु की इच्छा सशरीर स्वर्ग जाने की थी अतः इसके लिए उन्होंने वशिष्ठ जी से यज्ञ करने के लिए कहा। वशिष्ठ जी ने बताया कि कि मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं है कि मैं किसी व्यक्ति को शरीर सहित स्वर्ग भेज सकूँ।

 

 

 

ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के मना करने के  पश्चात त्रिशंकु ने यही प्रार्थना वशिष्ठ जी के पुत्रों से की जो उस समय दक्षिण प्रांत में घोर तपस्या कर रहे थे।  इस वे क्रोधित हो उठे और बोले, ” जो कार्य मेरे पिताजी ने नहीं किया उस कार्य को तू हम लोगों से करवाना चाहता है।  इसका मतलब तू उनका अपमान करना चाहता है।  ”

 

 

 

इस पर त्रिशंकु उन्हें अपशब्द कहने लगे।  इससे क्रोधित होकर वशिष्ठ जी कके पुत्रों ने त्रिशंकु को चांडाल हो जाने का श्राप दे दिया।  श्राप के कारण राजा चांडाल बन गए लेकिन उन्होंने सशरीर स्वर्ग जाने की इच्छा का परित्याग नहीं किया।

 

 

 

इसके बाद वे महर्षि विश्वामित्र के पास पहुंचे।  उस समय तक उन्हें ब्रह्मर्षि की उपाधि नहीं मिली थी।  जब उन्हें पता चला कि ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने इस कार्य के लिए मना कर दिया है तो उन्होंने इस कार्य करने के लिए हाँ कह दिया।

 

 

 

अपने शिष्यों के द्वारा वशिष्ठ के पुत्रों सहित वन में रहने वाले सब ऋषि – मुनियों को यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए निमंत्रण भी भिजवा दिया। शिष्यों ने लौटकर बताया कि सब ऋषि-मुनियों ने निमन्त्रण स्वीकार कर लिया है किन्तु वशिष्ठ जी के पुत्रों ने यह कहकर निमन्त्रण अस्वीकार कर दिया कि जिस यज्ञ में यजमान चाण्डाल और पुरोहित क्षत्रिय हो उस यज्ञ का भाग हम स्वीकार नहीं कर सकते।

 

 

 

यह सुनकर विश्वामित्र जी ने क्रुद्ध होकर कहा, ” उन्होंने अकारण ही मेरा अपमान किया है। मैं उन्हें श्राप देता हूँ कि उन सबका नाश हो।  आज ही वे सब कालपाश में बंधकर यमलोक को जाएँ और सात सौ वर्षों तक चांडाल बनकर विचरण करें।

 

 

 

वशिष्ठ जी के पुत्रों के परिणाम से भयभीत होकर सभी ऋषि – मुनियों ने विश्वामित्र का साथ दिया।  यज्ञ की समाप्ति पर विश्वामित्र ने सब देवताओं को नाम लेकर अपने – अपने यज्ञ भाग ग्रहण करने का आह्वान किया।

 

 

 

लेकिन कोई भी देवता अपना भाग लेने नहीं आया।  इस पर Vishwamitra Ji ने मन्त्र पढ़ते हुए  आकाश में  में जल छिड़का और राजा त्रिशंकु सशरीर आकाश में चढ़ाते हुए स्वर्ग जा पहुंचे।

 

 

 

 

त्रिशंकु को स्वर्ग में आया देख इन्द्र ने क्रोध से कहा कि रे मूर्ख! तुझे तेरे गुरु ने शाप दिया है इसलिये तू स्वर्ग में रहने योग्य नहीं है। इन्द्र के ऐसा कहते ही त्रिशंकु सिर के बल पृथ्वी पर गिरने लगे और विश्वामित्र से अपनी रक्षा की प्रार्थना करने लगे।

 

 

 

Vishwamitra Ji ने उन्हें अपनी मंत्र शक्तियों से रोक दिया।अब वे आधार में ही सिर के बल लटक गए।  त्रिशंकु की पीड़ा को देखकर विश्वामित्र जी ने वहीँ अपने तपोबल से स्वर्ग की रचना  कर दी।

 

 

 

यह देखकर इन्द्र  सहित सभी देवता भयभीत होकर Vishwamitra Ji की प्रार्थना करने लगे।  इसपर विश्वामित्र जी बोले, ” मैंने त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेजने का वचन दिया था, इसलिए मेरे द्वारा बनाया गया यह स्वर्ग हमेशा विद्यमान रहेगा और त्रिशंकु सदा अमर होकर इस नक्षत्र मंडल में राज करेगा।

 

 

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